
15 अप्रैल 2026

ने को पत्र लिखकर अयोध्या स्थित के मूल स्थान की शास्त्रीय स्थिति और वहां स्थापित पीतल की ‘ज्योतिस्वरूप’ कलाकृति पर गंभीर आपत्ति जताई है। उन्होंने इसे शास्त्रीय मर्यादाओं के विपरीत बताते हुए परंपराओं के साथ किया गया “अक्षम्य ब्लंडर” कहा है।
शंकराचार्य ने अपने पत्र में कहा कि मर्यादा पुरुषोत्तम की जन्मभूमि का प्रत्येक कण वंदनीय है। विशेष रूप से वह स्थान, जहां पहले केंद्रीय गुंबद था और लंबे समय तक प्रभु का ‘चल विग्रह’ प्रतिष्ठित रहा, अत्यंत पवित्र और संवेदनशील माना जाता है। उन्होंने ट्रस्ट से यह भी पूछा है कि क्या वर्तमान भव्य मंदिर का गर्भगृह मूल जन्मस्थान से अलग बनाया गया है। उनके अनुसार यदि ऐसा हुआ है तो यह शास्त्र और परंपरा की दृष्टि से गंभीर भूल मानी जाएगी, क्योंकि गर्भगृह का स्थान परंपरागत रूप से अपरिवर्तनीय माना जाता है।

उन्होंने वहां स्थापित पीतल की ‘ज्योतिस्वरूप’ कलाकृति पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि ज्योति का अर्थ अग्नि और तेज तत्व से होता है। केवल पीतल की आकृति को ज्वाला का रूप दे देने से वह वास्तविक ज्योति नहीं हो जाती। बिना घी, तेल और वर्तिका के किसी जड़ वस्तु को ‘ज्योति’ कहना शास्त्रीय परिभाषाओं के विरुद्ध है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि जो आकृति स्वयं प्रकाश के लिए बिजली पर निर्भर हो, उसे ‘अखंड ज्योति’ कहना उचित नहीं है।
शंकराचार्य ने ट्रस्ट से मांग की है कि मुख्य गर्भगृह और ‘ज्योतिस्वरूप’ वाले स्थान के शास्त्रीय संबंध को स्पष्ट किया जाए। साथ ही उन्होंने सुझाव दिया कि उस धातु कलाकृति को हटाकर वहां विधि-विधान से घी या तेल का दीपक स्थापित किया जाए, ताकि शास्त्रीय परंपरा के अनुरूप व्यवस्था बनी रहे।
उन्होंने कहा कि राम मंदिर जैसे महत्वपूर्ण धार्मिक केंद्र पर शास्त्रों और परंपराओं की अनदेखी भविष्य के लिए नुकसानदायक हो सकती है। साथ ही उन्होंने आशा जताई कि ट्रस्ट इस विषय में आवश्यक स्पष्टीकरण देगा और उत्पन्न हो रही भ्रांतियों को दूर करेगा।
इस संबंध में जानकारी शंकराचार्य के मीडिया प्रभारी संजय पाण्डेय द्वारा दी गई है।