

शुक्लागंज /गंगाघाट : इस्लाम धर्म के सबसे पवित्र
और अजीम दिनों में से एक है ईद-मिलाद-उन-नबी, जिसे आम बोलचाल में ‘बारावफात’ भी कहा जाता है। यह दिन पैगंबर हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के इस दुनिया में तशरीफ लाने (जन्म) की खुशी में मनाया

जाता है। इस्लामिक कैलेंडर के तीसरे महीने यानी ‘रबी-উল-अव्वल’ की 12 तारीख को पूरी दुनिया में यह पर्व बेहद अकीदत और धूमधाम के साथ मनाया जाता है।
रोशनी और सजावट का पर्व
इस मुबारक मौके पर चारों तरफ एक अलग ही रूहानी रौनक देखने को मिलती है। मस्जिदों, घरों, गलियों और बाजारों को रंग-बिरंगी लाइटों, झंडों और फूलों से सजाया जाता है। रात के समय जब हर तरफ रोशनी जगमगाती है, तो ऐसा लगता है जैसे कायनात पैगंबर की आमद की खुशी में झूम उठी हो। यह रोशनी सिर्फ बाहरी चमक-धमक नहीं, बल्कि दिलों को रोशन करने का पैगाम देती है।
जश्न का असली मक़सद: सीरत-उन्नबी
ईद-मिलाद-उन-नबी सिर्फ मेलों या सजावट तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पैगंबर साहब की जिंदगी और उनकी शिक्षाओ