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वाराणसी के कुंडों और सरोवरों पर उमड़ा माताओं-बहनों का सैलाब

Hamari sevaye

जिउतिया व्रत को लेकर काशी में भक्ति का माहौल, घाटों और पूजा स्थलों पर दिखी भारी चहल-पहल

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वाराणसी। संतान की दीर्घायु, अच्छे स्वास्थ्य और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना के लिए रखा जाने वाला पवित्र जीवित्पुत्रिका यानी जिउतिया व्रत श्रद्धा और आस्था के साथ शुरू हो गया। पर्व को लेकर काशी के विभिन्न कुंडों, सरोवरों और घाटों पर सुबह से ही माताओं-बहनों की भीड़ उमड़ने लगी। महिलाएं गाजे-बाजे और पारंपरिक पूजा सामग्री के साथ पूजा स्थलों पर पहुंचीं। शाम होते-होते प्रमुख घाटों और धार्मिक स्थलों पर श्रद्धालुओं की संख्या और बढ़ गई।
जिउतिया पर्व को लेकर काशी में विशेष धार्मिक उत्साह देखने को मिल रहा है। जगह-जगह महिलाएं समूह में पूजा की तैयारियां करती नजर आईं। कई स्थानों पर महिलाओं ने पारंपरिक तरीके से पूजा-अर्चना की और अपनी संतान की लंबी उम्र तथा परिवार की खुशहाली के लिए भगवान जीमूतवाहन से प्रार्थना की। पर्व के साथ ही काशी के पारंपरिक सोरहिया मेले का भी शुभारंभ हो गया, जिससे धार्मिक स्थलों के आसपास का माहौल और भी उत्सवमय हो गया।
निर्जला व्रत रखकर करती हैं संतान की मंगलकामना
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जिउतिया व्रत को अत्यंत कठिन व्रतों में माना जाता है। व्रती महिलाएं संतान के कल्याण और दीर्घायु की कामना से निर्जला व्रत रखती हैं। मान्यता के अनुसार व्रत की शुरुआत में महिलाएं उड़द के साबुत दाने ग्रहण करती हैं और इसके बाद कठिन व्रत का संकल्प लेती हैं। यह व्रत चौबीस घंटे से अधिक समय तक चलता है।
व्रत के दौरान माताएं जल तक ग्रहण नहीं करतीं और पूरी श्रद्धा के साथ पूजा-पाठ में लीन रहती हैं। दिनभर व्रत रखने के साथ रात में भी महिलाएं जागरण और पूजा-अर्चना करती हैं। परिवार की महिलाएं एक-दूसरे को पर्व की शुभकामनाएं देती हैं और जिउतिया व्रत से जुड़ी धार्मिक कथाओं का श्रवण करती हैं।
अष्टमी तिथि से शुरू होकर नवमी को होगा पारण
ज्योतिषाचार्यों के अनुसार आश्विन कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि 3 अक्टूबर की सुबह 8 बजकर 1 मिनट से शुरू होकर 4 अक्टूबर की भोर 5 बजकर 53 मिनट तक रहेगी। इस अवधि में व्रती महिलाएं निर्जला व्रत रखते हुए विधि-विधान से पूजा-अर्चना करेंगी। इसके बाद नवमी तिथि में 4 अक्टूबर की सुबह व्रत का पारण किया जाएगा।
पारण को लेकर भी महिलाओं में विशेष उत्साह है। व्रत के समापन के बाद महिलाएं विधि-विधान के अनुसार पूजा करने के बाद अन्न-जल ग्रहण करेंगी। परिवार के सदस्य भी इस अवसर पर व्रती महिलाओं की सेवा और पूजा की तैयारियों में सहयोग करते दिखाई दिए।
जिउतिया सूत्र का विशेष महत्व
जिउतिया पर्व में कच्चे सूत, सोने या चांदी से बने जिउतिया सूत्र का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है। महिलाएं पूजा के दौरान जिउतिया सूत्र को विधि-विधान से पूजती हैं। पूजा संपन्न होने के बाद इसे रक्षा सूत्र के रूप में गले में धारण किया जाता है। कई परिवारों में माताएं अपनी संतान को भी जिउतिया पहनाती हैं।
मान्यता है कि जिउतिया धारण करने से संतान की रक्षा और उसके सुखी एवं स्वस्थ जीवन की कामना पूरी होती है। इसी आस्था के चलते पर्व के दौरान जिउतिया सूत्र की खरीदारी को लेकर भी बाजारों में रौनक देखने को मिलती है।
घाटों पर दिखी काशी की पारंपरिक छटा
जिउतिया पर्व के अवसर पर काशी के घाटों का दृश्य भी बेहद मनोहारी नजर आया। शाम के समय घाटों पर महिलाओं की भीड़, पूजा की तैयारियां, धार्मिक गीत और मंत्रोच्चार से वातावरण भक्तिमय हो उठा। कई महिलाएं परिवार के सदस्यों के साथ घाटों और कुंडों पर पहुंचीं और पूजा-अर्चना की।
पर्व को लेकर शहर के विभिन्न हिस्सों में भी विशेष चहल-पहल देखने को मिली। पूजा सामग्री, फल-फूल और अन्य आवश्यक सामान की दुकानों पर भी लोगों की भीड़ नजर आई। जगह-जगह धार्मिक आयोजन और पारंपरिक गतिविधियां चलती रहीं।
सोरहिया मेले को लेकर भी उत्साह
जिउतिया पर्व के साथ काशी में लगने वाला पारंपरिक सोरहिया मेला भी लोगों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। मेले में महिलाओं और बच्चों की विशेष भीड़ देखने को मिल रही है। धार्मिक आस्था के साथ लोग मेले में पहुंचकर खरीदारी और भ्रमण भी कर रहे हैं।
पर्व को लेकर पूरे वाराणसी में उत्सव और भक्ति का माहौल बना हुआ है। माताएं अपनी संतान के उज्ज्वल भविष्य और लंबी उम्र की कामना के साथ कठिन निर्जला व्रत कर रही हैं। घाटों और कुंडों पर उमड़ी भीड़ ने एक बार फिर काशी की समृद्ध धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा की झलक दिखाई।

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