

फतेहपुर/धाता। बैरी ग्राम सभा स्थित प्राथमिक विद्यालय को लेकर बच्चों, अभिभावकों और स्थानीय लोगों से सामने आई शिकायतों ने सरकारी शिक्षा व्यवस्था की निगरानी पर तीखे सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप है कि विद्यालय में तैनात कुछ शिक्षक नियमित रूप से विद्यालय में दिखाई नहीं देते, जबकि उनकी उपस्थिति दर्ज होने की बात कही जा रही है। अगर जांच में यह आरोप सही पाया जाता है, तो सवाल सिर्फ अनुपस्थिति का नहीं बल्कि बच्चों की पढ़ाई और विभागीय निगरानी की पूरी व्यवस्था का बनता है।

बच्चों द्वारा बताए गए नामों में सौम्य प्रताप सिंह और प्रिया सिंह, सहायक अध्यापक शामिल हैं। बच्चों का कहना है कि दोनों शिक्षक कभी-कभार विद्यालय आते हैं और फिर लंबे समय तक नजर नहीं आते। स्थानीय लोगों का भी दावा है कि शिक्षकों की नियमित मौजूदगी को लेकर स्थिति संतोषजनक नहीं है।
बच्चों की जुबान से निकला सवाल—‘सर कब आएंगे?’
स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों का भविष्य किसी हाजिरी रजिस्टर की एक लाइन पर निर्भर नहीं होना चाहिए। बच्चे रोज विद्यालय पहुंचें और शिक्षक ही नियमित रूप से उपलब्ध न हों, तो सबसे बड़ा नुकसान पढ़ाई का होता है।
यही वजह है कि अब सवाल उठ रहा है—
क्या शिक्षक वास्तव में रोज विद्यालय पहुंच रहे हैं?
अगर नहीं, तो उनकी उपस्थिति कौन दर्ज कर रहा है?
क्या विद्यालय में अचानक निरीक्षण कर वास्तविक स्थिति देखी गई?
क्या बच्चों से अलग-अलग पूछकर शिक्षकों की उपस्थिति का सत्यापन किया गया?
‘कागज पर हाजिर, स्कूल में गायब’—आरोप सही तो मामला गंभीर
सबसे गंभीर आरोप उपस्थिति को लेकर है। यदि किसी शिक्षक की हाजिरी नियमित दर्ज हो रही है और उसी अवधि में उनकी वास्तविक उपस्थिति संदिग्ध मिलती है, तो शिक्षा विभाग को उपस्थिति रजिस्टर, डिजिटल/मानव उपस्थिति रिकॉर्ड, निरीक्षण पंजिका और विद्यालय के वास्तविक कक्षा संचालन का मिलान कराना चाहिए।
क्योंकि सवाल सिर्फ यह नहीं है कि शिक्षक आए या नहीं आए।
सवाल यह भी है कि अगर नहीं आए तो हाजिरी कैसे लगी?
और अगर शिक्षक नियमित रूप से आए हैं, तो जांच के दौरान इसकी पुष्टि भी होनी चाहिए।
बीआरसी, बीएसए से लेकर निगरानी तंत्र तक—अब जवाब जरूरी
शिक्षा विभाग के अधिकारियों से सीधा सवाल है कि विद्यालयों की निगरानी आखिर किस तरह की जा रही है। क्या अधिकारी सिर्फ रजिस्टर देखकर लौट जाते हैं या कभी अचानक पहुंचकर देखते हैं कि कक्षा में शिक्षक हैं भी या नहीं और बच्चों को पढ़ाया भी जा रहा है या नहीं?
अगर शिकायतें सामने आती हैं तो उनका समाधान कागजी कार्रवाई से नहीं, जमीन पर जांच से होना चाहिए।
ग्रामीणों की मांग है कि बैरी के विद्यालय में बिना पूर्व सूचना के निरीक्षण कराया जाए और जांच के दौरान—
- सभी शिक्षकों की वास्तविक उपस्थिति देखी जाए।
- उपस्थिति रजिस्टर और वास्तविक मौजूदगी का मिलान किया जाए।
- बच्चों से स्वतंत्र रूप से जानकारी ली जाए।
- कक्षा में पढ़ाई की स्थिति देखी जाए।
- विद्यालय की मूलभूत सुविधाओं और भवन की स्थिति की भी जांच हो।
- शिकायत सही पाए जाने पर नियमानुसार जिम्मेदारी तय की जाए।
अधिकारियों के लिए भी बड़ा सवाल—‘निरीक्षण कब होगा?’
अगर सब कुछ नियम के मुताबिक चल रहा है तो औचक जांच में दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा। लेकिन अगर शिकायतों में सच्चाई है, तो जांच से बचने के बजाय कार्रवाई जरूरी होगी।
बच्चों को समय पर स्कूल भेजने की जिम्मेदारी अभिभावकों की है, लेकिन बच्चों को पढ़ाने के लिए शिक्षक का समय पर विद्यालय पहुंचना भी उतना ही जरूरी है।
सरकारी स्कूल में पढ़ने वाला बच्चा किसी अधिकारी या शिक्षक की व्यक्तिगत सुविधा का इंतजार नहीं कर सकता। उसका समय लौटकर नहीं आता।
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बच्चे रोज स्कूल पहुंच रहे हैं, तो शिक्षक रोज क्यों नहीं दिख रहे?
अगर हाजिरी पूरी है तो वास्तविक उपस्थिति की जांच क्यों नहीं?
बीआरसी और बीएसए स्तर से औचक निरीक्षण कब होगा?
और अगर आरोप सही मिले तो जिम्मेदारों पर कार्रवाई कब होगी?
फिलहाल सामने आए आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और संबंधित शिक्षकों का पक्ष भी सामने आना बाकी है। इसलिए निष्पक्ष जांच के बाद ही अंतिम निष्कर्ष निकाला जाना चाहिए।
लेकिन इतना तय है कि बच्चों की पढ़ाई से जुड़ी शिकायत को हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए। यदि शिक्षक नियमित रूप से अनुपस्थित पाए जाते हैं तो विभाग को नियमों के अनुसार कार्रवाई करनी चाहिए, ताकि विद्यालय में शिक्षक समय पर पहुंचें और बच्चों की पढ़ाई प्रभावित न हो।