

कल पूजी जाएंगी ललई माता, लोक परंपराओं का होगा पालन,

संवाददाता प्रिंस गुप्ता, भदोही
भदोही। मां की ममता और संतान के प्रति अटूट प्रेम का प्रतीक ललई छठ यानी हलषष्ठी का पर्व कल 2 सितंबर, बुधवार को श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया जाएगा।
भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को पड़ने वाले इस पर्व पर माताएं संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना से व्रत रखेंगी। गांवों में पर्व को लेकर तैयारियां शुरू हो गई हैं।
ललई छठ को कई स्थानों पर हरछठ, हलछठ और हलषष्ठी के नाम से भी जाना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार यह दिन भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम जी के प्राकट्योत्सव से जुड़ा है। बलराम जी को हलधर कहा जाता है। इसलिए इस पर्व में हल, खेती और प्रकृति से जुड़ी परंपराओं का विशेष महत्व माना जाता है।
मां की ममता से जुड़ा है पर्व
ललई छठ के दिन माताएं व्रत रखकर षष्ठी माता और भगवान बलराम का स्मरण करती हैं। पूजा के बाद व्रत कथा सुनी जाती है और संतान की रक्षा तथा उसके सुखी जीवन की कामना की जाती है। पूर्वांचल के गांवों में महिलाएं समूह में पूजा करने के साथ पारंपरिक लोकगीत भी गाती हैं।
तिन्नी चावल और महुआ का विशेष महत्व
हलषष्ठी के व्रत में खान-पान को लेकर विशेष नियम माने जाते हैं। मान्यता के अनुसार इस दिन हल से जुती हुई जमीन में पैदा हुए अनाज का सेवन नहीं किया जाता। इसके स्थान पर तिन्नी यानी पसई के चावल और महुआ का प्रयोग करने की परंपरा है।
कई क्षेत्रों में इस दिन गाय के दूध और दही से परहेज करने तथा भैंस के दूध से बने पदार्थों का प्रयोग करने की परंपरा भी है। हालांकि पूजा और खान-पान के नियम अलग-अलग क्षेत्रों में स्थानीय मान्यताओं के अनुसार अलग हो सकते हैं।
कुश और महुआ के पत्ते से होती है पूजा
पूजा में कुश घास, महुआ के पत्ते, तिन्नी के चावल, फल-फूल और अन्य स्थानीय पूजन सामग्री का प्रयोग किया जाता है। महिलाएं पूजा के बाद ललई छठ की कथा सुनती हैं और संतान की लंबी उम्र तथा परिवार की सुख-शांति के लिए प्रार्थना करती हैं।
ग्वालिन और उसके पुत्र की लोककथा
ललई छठ से जुड़ी एक प्रसिद्ध लोककथा ग्वालिन और उसके पुत्र की है। कथा के अनुसार एक ग्वालिन को प्रसव पीड़ा हुई और उसने बछड़ों के स्थान के पास एक पुत्र को जन्म दिया। उसी दिन हलषष्ठी का व्रत था। कथा में बताया जाता है कि व्रत के नियमों का पालन नहीं होने के कारण उसके पुत्र पर संकट आया और वह जमीन में समा गया।
पुत्र के वियोग में ग्वालिन ने अपनी भूल का पश्चाताप किया और भगवान शिव तथा माता पार्वती की श्रद्धा से पूजा शुरू कर दी। उसने व्रत के नियमों का पालन करते हुए तिन्नी के चावल और महुआ का सेवन किया। लोकमान्यता के अनुसार उसकी भक्ति और तपस्या से प्रसन्न होकर देवी-देवताओं की कृपा हुई और उसका पुत्र दोबारा जीवित होकर उसके पास लौट आया।
परंपरा में छिपा है प्रकृति और श्रम का संदेश
ललई छठ केवल संतान की मंगलकामना का पर्व नहीं, बल्कि खेती, प्रकृति और श्रम के सम्मान से भी जुड़ा है। हल और खेत को महत्व देकर यह पर्व किसानों के परिश्रम की याद दिलाता है। वहीं व्रत के नियम संयम और प्रकृति के प्रति सम्मान का संदेश देते हैं।
जानिए ललई छठ के खास नियम
संतान की लंबी उम्र और अच्छे स्वास्थ्य के लिए व्रत रखा जाता है।
हल से जुती जमीन के अन्न का सेवन नहीं करने की परंपरा है।
तिन्नी यानी पसई के चावल और महुआ का विशेष महत्व है।
कई क्षेत्रों में गाय के दूध-दही से परहेज किया जाता है।
कुश, महुआ के पत्ते और स्थानीय सामग्री से पूजा की जाती है।
महिलाएं सामूहिक रूप से व्रत कथा सुनकर संतान की मंगलकामना करती हैं।
ललई छठ आज भी पूर्वांचल की लोक संस्कृति में मां की ममता, संतान के प्रति प्रेम और सदियों पुरानी परंपराओं की मजबूत पहचान के रूप में जीवित है।