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जलेबी की खुशबू, कजरी की गूंज और रातभर जागरण… बदलते दौर में धुंधली पड़ रही पूर्वांचल की अनोखी लोक परंपरा

जागरण पर्व पर विशेष: मां विंध्यवासिनी की मान्यता से जुड़ा पर्व, कभी गांव-गांव रातभर गूंजते थे कजरी के सुर

Hamari sevaye

30 अगस्त, रविवार | संवाददाता प्रिंस गुप्ता

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भदोही। जलेबी की खुशबू, ढोलक की थाप, मंजीरे की छनक और रातभर गूंजती कजरी… कभी पूर्वांचल के गांवों में जागरण पर्व की यही पहचान हुआ करती थी। भदोही सहित पूर्वांचल के कई जिलों में रविवार को जागरण पर्व मनाया जा रहा है। धार्मिक आस्था से जुड़े इस पर्व की अपनी समृद्ध लोक परंपराएं भी रही हैं। हालांकि बदलते समय के साथ सामूहिक कजरी और लोकगीतों की वह पुरानी रौनक अब धीरे-धीरे कम होती जा रही है।

जागरण पर्व पर आज भी बाजारों में जलेबी की दुकानें सजती हैं। गर्मागर्म जलेबी खरीदने के लिए लोगों की भीड़ उमड़ती है। घरों में जलेबी, दाना, अनरसा सहित पारंपरिक पकवान बनाए जाते हैं। बुजुर्गों के लिए यह पर्व आज भी उन दिनों की याद लेकर आता है, जब गांवों में रातभर गीत-संगीत का दौर चलता था।

मां विंध्यवासिनी के प्राकट्य से जुड़ी मान्यता

स्थानीय मान्यता के अनुसार भादों महीने के कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि को मां विंध्यवासिनी का प्राकट्य हुआ था। मां के प्राकट्य की खुशी में भक्त रातभर जागकर पूजा और स्तुति करते हैं। इसी कारण इसे जागरण पर्व कहा जाता है। स्थानीय बोली में कई जगह इसे ‘जगरवं’ भी कहा जाता है।

कजली के विरह गीतों से निकली कजरी की परंपरा

जागरण पर्व से जुड़ी लोककथा राजा ध्रुपद की बेटी कजली से भी जुड़ी है। लोक मान्यता है कि कजली अपने पति से बेहद प्रेम करती थीं और पति के वियोग में उन्होंने विरह के गीत गाए। आगे चलकर इन्हीं गीतों को कजरी के नाम से जाना जाने लगा।

इसी लोकविश्वास के चलते जागरण पर्व पर कजरी गायन की परंपरा विकसित हुई। महिलाएं समूह में बैठकर कजरी और लोकगीत गाती थीं। गीतों में प्रेम, विरह, परिवार और ग्रामीण जीवन की भावनाएं झलकती थीं।

आंगन में सजती थीं कजली माता

भदोही और आसपास के गांवों में आज भी कई परिवार जागरण पर्व पर पारंपरिक पूजा करते हैं। शाम को महिलाएं और कुंवारी कन्याएं घर-आंगन की सफाई करती हैं। कई जगह मिट्टी से कजली माता की आकृति बनाई जाती है या दीवार पर उनका प्रतीक बनाया जाता है।

पूजा में रोली, अक्षत, भीगे चने, हरी दूब और फल अर्पित किए जाते हैं। धूप-दीप जलाकर आरती की जाती है। कई परिवारों में महिलाएं व्रत भी रखती हैं और रात में चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद व्रत खोलती हैं।

जब ढोलक की थाप पर पूरी रात गूंजते थे गांव

जागरण पर्व की सबसे खास पहचान कजरी गायन रहा है। पूजा के बाद गांव की महिलाएं और पुरुष अलग-अलग समूहों में एकत्र होते थे। महिलाएं कजरी और लोकगीत गाती थीं, जबकि पुरुष ढोलक और मंजीरे की थाप से संगत करते थे।

कई गांवों में रातभर गीत-संगीत चलता था। बच्चे भी इन आयोजनों में शामिल होते थे। यही सामूहिक आयोजन नई पीढ़ी को बचपन से ही लोकगीतों और अपनी संस्कृति से जोड़ने का माध्यम बनते थे।

बुजुर्ग बताते हैं कि जागरण सिर्फ पूजा का पर्व नहीं था। यह गांव के लोगों को एक-दूसरे के करीब लाने का अवसर भी था। रिश्तेदार और पड़ोसी एक साथ बैठते, गीत-संगीत के बीच हंसी-मजाक होता और लोग एक-दूसरे का हालचाल जानते थे। इससे गांवों में आपसी भाईचारा मजबूत होता था।

अनरसा और शुद्ध घी की जलेबी भेजने की परंपरा

जागरण पर्व पर मिठाई भेजने की भी पुरानी परंपरा रही है। स्थानीय मान्यता के अनुसार भाई अपनी बहनों के घर अनरसा और शुद्ध घी की जलेबी लेकर जाते हैं। कई स्थानों पर इसे ‘जगरन भेजना’ कहा जाता है।

इसीलिए बुजुर्गों को आज भी जागरण पर्व का नाम सुनते ही घर में बनते पकवान, बाजार की गर्मागर्म जलेबी और रातभर गूंजती कजरी याद आ जाती है।

मोबाइल-इंटरनेट के दौर में सिमट गई सामूहिक कजरी

समय के साथ जागरण पर्व मनाने का तरीका भी बदल गया है। पहले गांवों में सामूहिक आयोजन बड़ी संख्या में होते थे, लेकिन अब ऐसे कार्यक्रम कम देखने को मिलते हैं। मोबाइल फोन, टेलीविजन और इंटरनेट ने मनोरंजन के साधन बदल दिए हैं।

नौकरी, कारोबार और बदलती जीवनशैली के कारण लोग पहले की तरह लंबे समय तक सामूहिक आयोजनों में नहीं बैठ पाते। इसका सीधा असर कजरी और लोकगीतों की पुरानी परंपरा पर पड़ा है।

हालांकि पूजा-पाठ और पारंपरिक रीति-रिवाज आज भी कई परिवारों में कायम हैं। ग्रामीणों का मानना है कि यदि गांवों में फिर से सामूहिक कजरी और लोकगीतों के कार्यक्रम आयोजित किए जाएं तो इस पुरानी परंपरा को नई जिंदगी मिल सकती है।

नई पीढ़ी से जुड़ी है लोक संस्कृति को बचाने की उम्मीद

ग्रामीणों के अनुसार जागरण पर्व केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि पूर्वांचल के पुराने सामाजिक जीवन और लोक संस्कृति की पहचान भी है। नई पीढ़ी को कजरी, लोकगीतों और पारंपरिक रीति-रिवाजों से जोड़ना जरूरी है।

समय बदला, मनोरंजन बदला और गांवों की रातें भी बदल गईं, लेकिन जलेबी की मिठास और कजरी के सुर आज भी जागरण पर्व की पहचान बने हुए हैं। जरूरत है तो बस इन्हें अगली पीढ़ी तक पहुंचाने की।

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